17.03.2017 - UNESCO Office in New Delhi

“Does art matter?” A workshop with arts organisations and visual artists in Kolkata “डज़ आर्ट मैटर?” कोलकाता में कला संगठनों और दृश्य कलाकारों के साथ एक कार्यशाला

© Hamdasti

Hamdasti Artists’ Collective, Kolkata, in collaboration with Centre for Social Sciences and Humanities (CSH) Delhi and UNESCO organised a workshop this March called “Does art matter? Evaluating the impact of community art and public art projects” at Makers Loft in Kolkata.

The workshop brought together 14 participants that included visual artists, art spaces in Kolkata like Studio 21, and other arts organisations. The organisations like Hamdasti, Studio 21, and St+Art Foundation presented the community art/public art projects that they have been involved in and spoke about aspects like community involvement in the projects, working with local authorities, attracting diverse audience, etc. 

The workshop was an attempt to understand how public art and community art projects contribute to local communities. It included discussions on issues related to evaluating ‘impact’ of public art projects, whether arts organisations and artists need to necessarily view their projects from the point of view of creating impact or bringing change, and what perhaps could be the potential framework for studying the change their work brings at the local level.

“डज़ आर्ट मैटर?” कोलकाता में कला संगठनों और दृश्य कलाकारों के साथ एक कार्यशाला

मार्च महीने में हमदस्ती आर्टिस्ट्स कलेक्टिव, कोलकाता ने सेंटर फॉर सोशल साइंसेज़ एंड ह्यूमैनिटीज़ (सीएचएस) दिल्ली और यूनेस्को के साथ मिल कर कोलकाता के मेकर्स लोफ्ट में एक कार्यशाला का आयोजन किया. इसका नाम था: “डज आर्ट मैटर? एवैलुएटिंग द इम्पैक्ट ऑफ कम्युनिटी आर्ट एंड पब्लिक आर्ट प्रोजेक्ट्स” जो इस पर विचार करता है कि क्या कला मायने रखती है और सामुदायिक कला और सार्वजनिक कला परियोजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है. 

कार्यशाला में 14 भागीदार आए थे, जिनमें दृश्य कलाकार, कोलकाता में कला स्थल जैसे कि स्टूडियो 21, और दूसरे कला संगठन शामिल हैं. हमदस्ती, स्टूडियो 21 और St+Art (स्टार्ट) जैसे संगठनों ने ऐसी सामुदायिक कला/सार्वजनिक कला परियोजनाओं पर प्रस्तुतियां दीं, जिनसे वो जुड़े रहे हैं. उन्होंने इन परियोजनाओं में सामुदायिक भागीदारी, स्थानीय अधिकारियों के साथ काम करने और अलग-अलग तरह के दर्शकों को आकर्षित करने के पहलुओं पर अपनी बात रखी.

कार्यशाला इस बात को समझने की एक कोशिश थी कि कैसे सार्वजनिक कला और सामुदायिक कला परियोजनाएं स्थानीय समुदायों में योगदान देती हैं. इसमें ऐसे मुद्दों पर बहस भी शामिल थी, जो सार्वजनिक कला परियोजनाओं के ‘प्रभाव’ के मूल्यांकन से जुड़े हुए हैं, जैसे यह सवाल कि क्या कला संगठनों और कलाकारों को अपनी परियोजनाओं को अनिवार्य रूप से इस तरह देखना चाहिए कि उनका प्रभाव पड़े और वे बदलाव ले आएं, और फिर उनकी कला द्वारा स्थानीय स्तर पर लाए जा रहे बदलावों के अध्ययन का संभावित ढांचा क्या हो सकता है.




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